नया सत्र शुरू होने के 40 दिन बाद भी खाली बस्ता लेकर जा रहे स्कूल – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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 लखनऊ। नगर व ग्रामीण क्षेत्र में यूपी बोर्ड के संचालित अधिसंख्य माध्यमिक स्कूलों में पढ़ने वाले छह से आठवीं के बच्चों को सरकारी किताबें नहीं मिली हैं। नए शैक्षिक सत्र के 40 दिन बाद भी बच्चों के बस्ते खाली हैं।

प्राइमरी स्कूलों की तर्ज पर इन स्कूलों के बच्चों को बेसिक शिक्षा विभाग की नि:शुल्क दिये जाने का नियम है। प्राइमरी स्कूलों में काफी हद तक किताबें पहुंच गईं हैं, लेकिन शुक्रवार तक अधिकांश माध्यमिक स्कूलों के बच्चों को किताबें नहीं मिलीं। कुछ स्कूलों में आधी आधूरी किताबें ही पहुंची हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत छह से 14 वर्ष के बच्चों को नि:शुल्क किताबें दिये जाने का प्रावधान है। कक्षा एक से आठवीं के बच्चों की किताबें व कार्य पुस्तिकाएं बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से नि:शुल्क मुहैया करायी जाती हैं। लखनऊ में 101 अशासकीय सहायता प्राप्त स्कूल, 56 राजकीय और 600 से अधिक निजी स्कूल में करीब 50 हजार बच्चे पंजीकृत हैं। यहां कक्षा नौ से 12 वीं के बच्चों को उप्र. माध्यमिक शिक्षा परिषद की ओर से नामित एनसीईआरटी के किताबों से पढ़ाया जाता है। ब्लॉक वार किताबों के स्टाल लगाकर किताबें मुहैया करायी जा रही हैं,लेकिन कक्षा छह से आठ के बच्चों को किताबें नहीं मिल पा रही हैं। कई स्कूलों के प्रधानाध्यापकों ने अधिकारियों से किताबों की मांग उठायी है।

वहीं गोसाईगंज के रामपाल त्रिवेदी इण्टर कॉलेज में रविवार को कक्षा नौ से 12 वीं के छात्रों के लिये एनसीईआरटी की किताबों का स्टॉल लगाया गया। बच्चों ने यहां से सस्ती किताबें खरीदीं।

प्राइमरी समेत माध्यमिक स्कूलों के बच्चों को सरकारी किताबें मुहैया करा दी गईं हैं। पता किया जाएगा कि अभी तक इन माध्यमिक स्कूलों को किताबें क्यों नहीं मिलीं।

विपिन कुमार, बीएसए

बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही। शासन व विभाग के अधिकारियों को चाहिए कि कक्षा छह से आठ के बच्चों को किताबें जल्दी मुहैया कराएं। सोहनलाल वर्मा प्रदेश अध्यक्ष, उप्र. माध्यमिक शिक्षक संघ एकजुट

शिक्षकों का कहना है कि बिना किताबों के बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। स्कूल में तो पढ़ा दिया जाता है, लेकिन किताबें व कार्य पुस्तिका न होने से बच्चे घर अभ्यास नहीं कर पा रहे हैं। बच्चे व अभिभावक स्कूल आकर शिक्षकों पर किताबें देने का दबाव बना रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि ये सरकारी किताबें बाजार में उपलब्ध नहीं है। जिसके चलते बिना किताबों के बच्चों को पढ़ाने में मुश्किलें आ रही हैं।

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