शिक्षा में सुधार के कुछ सरकारी कदम विवादास्पद बनते जा रहे हैं। हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब 5,000 स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया है। इससे पहले राजस्थान और अन्य राज्यों की सरकारें भी हजारों स्कूलों को विलय के नाम पर बंद कर चुकी हैं। तर्क दिया जा रहा है कि जहां 50 से कम बच्चे हैं, उन्हें नजदीकी स्कूल में स्थानांतरित किया जाएगा।
जो लोग देश के छह लाख से अधिक गांवों से परिचित हैं, वे शिक्षा पर इसके भयानक दुष्परिणाम की कल्पना कर सकते हैं। लगातार प्रयासों के बाद हमारी साक्षरता दर 80 प्रतिशत तक पहुंची है, जिसमें लड़कियों की साक्षरता दर विशेष रूप से उत्तर भारत में बहुत कम है। बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति तो समग्र साक्षरता में निराशाजनक है। यदि नजदीकी स्कूल बंद हुए, तो इसका सबसे बुरा असर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ेगा, जो किसी भी समाज और देश के विकास के लिए एक बुनियादी शर्त है। देश की लड़कियां कम सुविधाओं के बावजूद हर क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन कुछ नीतियां उलटे उनके खिलाफ जाती दिख रही हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए लाई गई नई प्रवेश परीक्षा सीयूईटी ने भी उनके नामांकन पर असर डाला है। आंकड़े बताते हैं कि इसके लागू होने के बाद से इन विश्वविद्यालयों में लड़कियों के दाखिले में 30 प्रतिशत तक की कमी आई है। दिल्ली विश्वविद्यालय में ही नामांकन अब केवल उत्तर भारत के तीन-चार राज्यों तक सीमित होकर रह गया है, जिसमें कभी पूरे देश के मेघावी युवा आते थे। इस बीच विदेश में पढ़ने वालों की संख्या पिछले पांच वर्षों में दोगुनी से भी अधिक हो गई है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम कहता है कि पहली से पांचवीं कक्षा तक हर बच्चे के लिए एक किलोमीटर पर स्कूल होना चाहिए और छठी से आठवीं कक्षा तक हर बच्चे के लिए तीन किलोमीटर के दायरे में ही स्कूल होने चाहिए। संभवतः उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पक्ष पर गंभीरता से विचार नहीं किया है। इसके पीछे वे नीति निर्माता प्रतीत होते हैं जिनमें से अधिकतर नगरों, महानगरों और विदेश और अंग्रेजी माध्यममें पढ़े हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान शिक्षा में कुछ अच्छे काम किए थे, जिसमें 60 हजार शिक्षकों की भर्ती भी शामिल थी। इससे सभी स्कूलों में योग्य शिक्षक उपलब्ध हो गए हैं। इस बीच शौचालय और अन्य भवनों में भी बहुत सुधार हुआ है, लेकिन अकेले इस कदम से पिछले दशकों में साक्षरता, रता, शिक्षा और स्कूलों को बेहतर करने के प्रयासों को बहुत बड़ा धक्का लगेगा। इस यू-टर्न से भारत के विकसित देश बनने का सपना बिखर सकता है।
इस बात की गहराई से पड़ताल होनी चाहिए कि सरकारी स्कूलों में बच्चे क्यों कम हो रहे हैं? शिक्षकों पर कुछ अन्य अतिरिक्त काम जैसे जनसंख्या से जुड़े आंकड़े जुटाने, चुनाव कराने, बैंक खाता खुलवाने, मिड डे मील योजना को लागू करने जैसी जिम्मेदारियां कम क्यों नहीं की जा सकती हैं? क्यों जिला स्तर पर इन स्कूलों में निरीक्षण और उनकी समस्याएं सुनने का तंत्र विकसित नहीं हो पाया है? उनके मोटिवेशन के लिए जिला स्तर पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? सर्वे बताते हैं कि जिला अधिकारीमुश्किल से पांच प्रतिशत सरकारी स्कूलों में जाते हैं। सरकारी स्कूलों में सरकार छात्रों को यूनिफार्म देती है, वजीफा देती है, कोई फीस नहीं लेती और प्रतियोगी परीक्षाओं से चुने हुए योग्य शिक्षक नियुक्त होते हैं। इसके बावजूद वहां बच्चे नहीं आते। यह आजाद भारत के लिए सबसे बड़ी विडंबना है। यह सरकारी तंत्र की असफलता है। 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निर्णय भी दिया था कि हर सरकारी कर्मचारी, विधायक आदि के बच्चों का इन स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य हो। विकसित भारत की संकल्पना को साकार करने के लिए सरकार को इसे लागू करना चाहिए। इसके साथ-साथ स्कूलों में पुस्तकालय, प्रयोगशाला और बेहतर पाठ्यक्रम अपनी भाषा में बनाया जाना चाहिए। इससे बच्चे अंग्रेजी के बोझ से मुक्त होंगे और आत्मनिर्भर भी बनेंगे। जिला स्तर पर इस बुनियादी परिवर्तन से ही सरकारी स्कूल चमकने लगेंगे।
नई शिक्षा नीति के नियम का भी इस पर असर पड़ा है। नियम कहता है कि पहली क्लास में छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों का नामांकन नहीं होगा। इसके चलते बच्चे सरकारी स्कूलों में आने बंद हो गए हैं। इस बीच कुकुरमुत्ते की तरह बिना ठीक-ठाक बिल्डिंग, शौचालय, खेल की सुविधाओं के निजी स्कूलों में दाखिले की बाढ़ आ गई है। एक बार बच्चा वहां दाखिल हो गया, तो उसे निकालना आसान नहीं होता। इसलिए दाखिले की उम्र तुरंत पांच वर्ष करने की जरूरत है। इन स्कूलों में शिक्षक भर्ती की योग्यता का भी कोई पैमाना नहीं है। रोजगार का पक्ष भी उत्तना ही महत्वपूर्ण है। बेरोजगार नौजवानों में बढ़ता असंतोष बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा और राज्यों के आने वाले विधानसभा चुनावों पर भी इसका असर हो सकता है। हर वर्ष 25 जून को हम आपातकाल को याद करते हैं, जिसमें लोगों की आवाज को पूरी तरह से अनसुना कर दिया गया था या रोक दिया गया था। बेहतर शिक्षा, समान शिक्षा हर लोक का हक है। और यही लोकतंत्र है। सरकार को इन सब बातों पर गंभीरता से पुनर्विचार की जरूरत है। (भारत सरकार में संयुक्त सचिव रहे लेखक शिक्षाविद् हैं)
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