प्रयागराज, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि अधिनियम की धारा 8 एवं 9 के अंतर्गत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन कर लिया गया हो, तो अफसर अनिश्चितकालीन जांच, संदेह या व्यक्तिगत संतुष्टि के आधार पर किसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन अथवा धार्मिक पहचान को बाधित नहीं कर सकते।
न्यायमुर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया, जो वर्ष 2022 से लंबित थी। याचिका डॉ. मोहम्मद अहसान उर्फ अनिल पंडित की ओर से दाखिल की गई थी, जो प्रयागराज स्थित सीएमपी डिग्री कॉलेज में अंग्रेजी विषय के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उन्होंने सनातन धर्म अपनाने की वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण कर ली थी, बावजूद इसके प्रशासनिक स्तर पर उनके धर्म परिवर्तन को मान्यता नहीं दी जा रही थी। याची की पत्नी बलिया के राजकीय इंटर कॉलेज में अंग्रेजी विषय की प्रवक्ता हैं।
प्रशासनिक अस्वीकार्यता के चलते दंपती को विवाह पंजीकरण, पहचान पत्र, शासकीय अभिलेखों और अन्य वैधानिक अधिकारों से संबंधित गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। इससे उनकी वैवाहिक पहचान एवं भविष्य के पारिवारिक अधिकारों पर भी अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। मामले में याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्रशासनिक अधिकार संविधान प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं हो सकते तथा वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद अड़चनें विधिसम्मत नहीं मानी जा सकतीं।
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