समायोजन की उलझन में फंसी बेसिक शिक्षा व्यवस्था, आखिर जिम्मेदार कौन? – UpdateMarts| PRIMARY KA MASTER | SHIKSHAMITRA | Basic Shiksha News

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उत्तर प्रदेश की बेसिक शिक्षा व्यवस्था में चल रही समायोजन प्रक्रिया अब केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह शिक्षकों के अधिकार, वरिष्ठता, न्याय और नीति निर्माण पर बड़ा प्रश्न बन चुकी है। लगातार आ रहे न्यायालयों के निर्णयों और विभागीय कार्रवाइयों के बीच शिक्षकों के मन में असंतोष और असुरक्षा दोनों बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

न्यायालयों के आदेशों ने बढ़ाई जटिलता

हाल के वर्षों में विभिन्न मामलों में न्यायालयों ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और आदेश दिए—

  • विद्यालय स्तर पर जूनियर शिक्षक का समायोजन संभव नहीं माना गया। (रीना सिंह केस)

  • जिले स्तर पर जूनियर शिक्षक के समायोजन पर भी रोक जैसी स्थिति बनी। (पुष्कर सिंह चंदेल केस)

  • हेड/प्रधानाध्यापक के समायोजन को लेकर भी प्रश्न खड़े हुए। (आनंद मोहन मिश्रा, बहराइच याचिका)

इन परिस्थितियों के बाद अब विभाग के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में चर्चा यह है कि अब विद्यालयों से वरिष्ठ शिक्षकों को हटाने या दूरस्थ स्थानों पर भेजने की तैयारी की जा रही है।

आखिर गलती कहाँ हुई?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आज यह स्थिति पैदा क्यों हुई?

वर्षों तक ऐसे विद्यालयों में भी नए शिक्षकों की तैनाती की गई, जहां छात्र संख्या पहले से कम थी।
यानी—

  • RTE एक्ट के मानकों का सही पालन नहीं हुआ,

  • शिक्षक-छात्र अनुपात का संतुलन बिगड़ा,

  • और वास्तविक आवश्यकता का आकलन किए बिना नियुक्तियाँ व तैनाती होती रहीं।

विडंबना यह है कि इन निर्णयों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
बल्कि अब उसी विद्यालय में वर्षों से कार्यरत वरिष्ठ शिक्षक को हटाने की स्थिति बन रही है, जिसने अपने प्रयासों से उस विद्यालय को स्थापित और व्यवस्थित किया।

वरिष्ठ शिक्षक क्यों महसूस कर रहे हैं उपेक्षित?

वे शिक्षक जो सबसे पहले विद्यालय में नियुक्त हुए, जिन्होंने वर्षों तक विद्यालय को संभाला, छात्र संख्या बढ़ाने का प्रयास किया और स्थानीय स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाया — आज वही स्वयं को सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

उनका मानना है कि—

“जिस विद्यालय पर हमारा सबसे अधिक नैतिक और सेवा आधारित अधिकार था, आज उसी विद्यालय से हमें हटाने की तैयारी हो रही है।”

यह भावना केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में नीति असंतुलन की ओर भी संकेत करती है।

क्या बेहतर विकल्प मौजूद थे?

कई शिक्षक संगठनों और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि समायोजन का संकट पहले ही हल किया जा सकता था।

1. प्रभारी प्रधानाध्यापक व्यवस्था का प्रभावी क्रियान्वयन

प्रभारी प्रधानाध्यापक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रभारियों को हेड का वेतन देने के आदेश के बाद, माननीय उच्च न्यायालय में गिरी साहब द्वारा यह निर्देश दिया गया था कि—

जिले की वरिष्ठता सूची बनाकर प्रत्येक विद्यालय में प्रभारी प्रधानाध्यापक नियुक्त किए जाएँ।

यदि इस व्यवस्था को पूरी गंभीरता से लागू किया जाता, तो पूरे प्रदेश में शिक्षकों का संतुलन स्वतः स्थापित हो सकता था और समायोजन की बड़ी समस्या काफी हद तक समाप्त हो जाती।

लेकिन शिक्षकों का आरोप है कि न्यायालयों के इन आदेशों को भी प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया।

2. एक विद्यालय/ब्लॉक में अधिकतम कार्यकाल तय करना

दूसरा आसान विकल्प यह था कि—

ऐसी व्यवस्था होने पर 10 वर्ष पूर्ण होने के बाद शिक्षक स्वतः अन्य विद्यालय/ब्लॉक में स्थानांतरित हो जाते और समायोजन की प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से पूरी होती रहती।

3. सुदूर ग्रामीण सेवा नियम का पालन

बेसिक शिक्षा नियमावली में पहले से प्रावधान है कि—

  • प्रत्येक शिक्षक को 5 वर्ष सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देनी होगी,

  • जबकि महिला शिक्षिकाओं के लिए यह अवधि 2 वर्ष निर्धारित है।

यदि इस नियम को व्यवस्थित रूप से लागू किया जाता, तो भी शिक्षकों का संतुलन बेहतर ढंग से बनाया जा सकता था।

स्वैच्छिक समायोजन को माना जा रहा बेहतर मॉडल

शिक्षकों के बीच यह धारणा भी मजबूत है कि “समायोजन 1” और “समायोजन 2” जैसी स्वैच्छिक प्रक्रियाएँ अब तक की सबसे संतुलित और बेहतर व्यवस्थाएँ थीं।
क्योंकि उनमें शिक्षकों को विकल्प और सहमति दोनों का अवसर मिला था।

अब परिस्थितियाँ संकेत दे रही हैं कि वरिष्ठ समायोजन के मामलों में भी न्यायालयी चुनौती और स्टे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

जरूरत संतुलित और मानवीय समाधान की

समायोजन केवल संख्या संतुलन का विषय नहीं है। यह शिक्षकों के सम्मान, अनुभव, मनोबल और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा मामला है।

जरूरत इस बात की है कि—

  • RTE मानकों का वास्तविक पालन हो,

  • वरिष्ठता और सेवा अनुभव का सम्मान किया जाए,

  • न्यायालयों के आदेशों को गंभीरता से लागू किया जाए,

  • और ऐसी नीति बने जिससे शिक्षक संतुष्ट भी रहें और शिक्षा व्यवस्था भी संतुलित रहे।

क्योंकि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की मजबूती केवल भवनों से नहीं, बल्कि संतुष्ट और सम्मानित शिक्षकों से तय होती है।

— अनुराग सिंह

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